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आदतें!

A poetry(without a poetic scheme) after a long time. It is about habits we possess. Hope you find it good :) आदतें! इतनी जुडी है हमसे, की पहचान बन जाती है | शक्ल सूरत और अंगूठों क निशाँ, का विकल्प बन जाती हैं| आदतें! आग की तरह फैलती है, आदतें बड़ी 'contagious' होती है| पानी से नहीं, हवा से नहीं, बस साथ वक़्त बिताने से फैलती है| आदतें! अच्छी, बुरी, सस्ती, मेहेंगी हर तरह की होती है आदतें| सब अपनी मर्ज़ी और औकात अनुसार, पालते है  आदतें| आदतें! याद दिलाती है आदतें, बल्कि यादों का हिस्सा होती है| उस बच्चे को नाख़ून खाता देख, मुझे अपनी याद आती है| आदतें हरकतों तक सीमित हो तो भी ठीक है, अक्सर इंसानों की आदत हो जाती है| इस आदत को शायद प्यार कहते हैं|

क्या करूँ मैं?

A small poem on confusion, a person goes through before working towards a goal. क्या करूँ मैं ? क्या मुझे पाना है? मुझे भी अबतक है कहाँ पता| मंजिल तो तय हो पहले, मिल ही जाएगा रास्ता| सोचता हूँ, यूँही निकल पड़ूं, रास्ता ही मंजिल बता देगा| फिर सोचता हूँ, अगर मोड़ आया कोई, तो किस बुनियाद पर करूँगा फैसला| तो बस, मंजिल तय करना ही पहली मंजिल है, देखते है कहाँ ले जाता मुस्तकबिल है| सोचा एक फहरिस्त बना देते हैं| तरजीह के मताबिक, हर हसरत लिख देते हैं| जो हसरत अव्वल होगी, वही मंजिल होगी| तोलने लगा हसरतों को, पर कुछ समझ नहीं आया| ये हसरतें तो लिपटी है एकदूसरे से, जैसे तानाबाना है कोई ऊनी धागों का| बड़ी मुश्किल से, हर धागा अलग किया, गिरहें पढ़ गयी थी, उन्हें भी सुलझा दिया| कहियों को तोडना भी पड़ा, ज़रूरी था| अब फहरिस्त तैयार है, पर सही रास्ते की अबतक दरकार है| क्या करूँ  मैं? For more poems  Click here