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ज़िन्दगी की जद्दोजहद तो चलती रहेगी।

ज़िन्दगी की जद्दोजहद तो चलती रहेगी।

रोज़ वही सांसें लेकर, 
ऊब नहीं जाते?
कभी हवा बदल कर देखिये,
सांसें नई सी लगेंगी।
बाकी, 
ज़िन्दगी की जद्दोजहद तो चलती रहेगी।  

हर रोज़ रात को सोना, सुबह उठना,
कितना नीरस लगता है ।
कभी नींद को टालकर देखो,
तारों की सांगत अच्छी लगेगी
बाकी, 
ज़िन्दगी की जद्दोजहद तो चलती रहेगी।   

२ हफ़्तों की ड्यूटी के  बाद,
चाँद भी आराम फ़रमाता है । 
कुछ पल चुराके, ज़रा सुस्ता लो,
अंगड़ाइयां अच्छी लगेंगी । 
बाकी, 
ज़िन्दगी की जद्दोजहद तो चलती रहेगी। 

"मेरा  काम अहम है,
यह छुट्टियां फ़िज़ूल है उसके आगे । "
 ऐसे ख्याल जो ज़हन में आता हो,
तो आराम आपके लिए है, और भी ज़रूरी  । 
बाकी, 
ज़िन्दगी की जद्दोजहद तो चलती रहेगी।

याद है? वो गर्मी की छुट्टियां,
उतनी लम्बी ज़मानत तो नहीं मिल सकती । 
अर्ज़ियाँ बेहिचक दायर कीजिए ,
छोटी मोटी राहतें तो मिलती रहेगी । 
बाकी, 
ज़िन्दगी की जद्दोजहद तो चलती रहेगी।



Pata hi nahi chala..

पता ही नहीं चला,
 यह कब हुआ?

कब वह पंछियों की आवाजें,
सुरों से शोर में बदल गई|
कब तारे यूँ पराये हो गए,
की जैसे एक अरसे से मिले नहीं है|

कब दुनियादारी के दांव पेंच सीखे|
कब दफ्तर की ज़िम्मेदारी को जाना|
कब रंग बिरंगे ख्वाब,
पैसों के हरे नोटों से भर गए|

पता ही नहीं चला,
 मैं कब बड़ा हुआ?

kabhi puch toh lia hota?



kabhi puch toh lia hota?

ki jo meri soch hai,
mera maanna hai,
jo mera hona hai,
woh hai toh kyun hai?

kabhi puch toh lia hota?

muje nahi aata,
uljhakar kuch kehna..
tumhein bhi,
do tuk samja leti..

kabhi puch toh lia hota?

yun path path par,
parakh parakh kar..
zamane ne banayi raay hai,
woh hai toh kyun hai?

kabhi puch toh lia hota?

khulkar naach lun toh,
bacchalan samaj lete hai..
muskurakar baat karun toh,
izhar e mohabbat samaj lete hai..

kabhi puch toh lia hota?

ab tak jaise jiya hai,
aage bhi jiyungi..

par tanga lagane se pehle,
kabhi puch lia hota toh acha hota..



Poetry Recitation: Kya har zindagi ek jaisi hoti hai?

क्या हर ज़िन्दगी एक जैसी होती है?

A poetry after a really long time. Its about how different our lives are despite being so similar. Do give it a read.

क्या हर ज़िन्दगी एक जैसी होती है?

सांसें में भी ले रहा हूँ,
साँसे तुम भी ले रहे हो
हवा भी वही है लगभग,
क्या तुम भी वैसे ही जी रहे हो?

क्या हर ज़िन्दगी एक जैसी होती है?

महज़ जिंदा रहना ही,
क्या जीना होता है?
हालात  अलग, तजुर्बे अलग,
तो सोच की बनावट अलग,
यूँही तो नहीं नजरिया अलग होता है

क्या हर ज़िन्दगी एक जैसी होती है?

तो क्या हर ज़िन्दगी,
मुख्तलिफ है?
दर्द मुझे भी होता है,
दर्द तुम्हें भी होता है|
मुस्कराहट मेरे पास भी है,
हँसना तुम भी जानते हो|
दिन और रात के झूले में,
तुम भी झूलते हो और मैं भी|

पर कुछ एक जैसा होने से,
सब कुछ एक जैसा होना ज़रूरी तो नहीं|
अगर हर ज़िन्दगी एक जैसी होती तो,
तुम्हें 'तुम' कहने और मुझे 'मैं' कहने की क्या ज़रूरत पढ़ती?





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